ओमलो मूवी रिव्यू: राजस्थान की मिट्टी से जुड़ी दर्द और उम्मीद की सच्ची कहानी

सोनू रणदीप चौधरी के निर्देशन में बनी 'ओमलो' राजस्थान की संस्कृति और परंपरा को समेटे पीढ़ी दर पीढ़ी के दर्द, घरेलू हिंसा और उम्मीद की मार्मिक कहानी पेश करती है। एक संवेदनशील सामाजिक ड्रामा जो दिल छू लेता है।

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Bolly Orbit Verified Media or Organization • 25 Apr, 2026Super Admin
July 6, 2026 • 1:42 AM  0
मूवी रिव्यु
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ओमलो मूवी रिव्यू: राजस्थान की मिट्टी से जुड़ी दर्द और उम्मीद की सच्ची कहानी
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6 Jul 2026
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movie Movie Review

ओमलो

8
Out of 10

info Movie Details

movie Movie Nameओमलो
calendar_month Release Date03 Jul, 2026
schedule Duration1 घंटा 32 मिनट
language Languageहिंदी (राजस्थानी)
movie_creation Directorसोनू रणदीप चौधरी
monetization_on Producerनेहा पांडे, रोहित मखीजा, मनीष गोपलानी, सोनू रणदीप चौधरी
star Lead Castशम्भो महाजन, सोनू रणदीप चौधरी, सोनाली शर्मिष्ठा
groups Supporting Castदेवा शर्मा, महेश जिलोवा, वंदना गुप्ता
live_tv Platform वेव्स ओटीटी (Now Streaming)
event_available Availability check_circle Now Streaming

ऐसे समय में जब ज्यादातर फिल्में बड़े सितारों, भव्यता और मनोरंजन के फॉर्मूले के आसपास घूमती हैं, वहीं हिन्दी (राजस्थानी) फिल्म 'ओमलो' समाज के उस दर्दनाक सच को सामने लाती है जिसके बारे में अक्सर लोग बात करने से बचते हैं। निर्देशक और लेखक सोनू रणदीप चौधरी ने घरेलू हिंसा, महिला उत्पीड़न, पितृसत्तात्मक सोच और पीढ़ियों से चल रहे मानसिक आघात जैसे गंभीर विषयों को बेहद संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारने की कोशिश की है। उनकी कहानी कहने की शैली और निर्देशन फिल्म को केवल एक सामाजिक कहानी नहीं रहने देते बल्कि दर्शकों को राजस्थान की मिट्टी, उसकी संवेदनाओं और जीवन शैली से भी जोड़ते हैं। यह फिल्म केवल एक कहानी नहीं सुनाती बल्कि दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हिंसा और दर्द की यह विरासत कब टूटेगी।

कहानी :

फिल्म की कहानी राजस्थान के एक दूरदराज रेगिस्तानी गांव से शुरू होती है जहां तपती धूप के बीच मजदूरी करके लौट रही सावित्री अपने बच्चों के साथ घर की ओर निकलती है। उसके सिर पर मेहनत का बोझ है और जिंदगी की जिम्मेदारियां भी। फिल्म की शुरुआत से ही दर्शक गांव की उस दुनिया में पहुंच जाता है जहां संघर्ष रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है और राजस्थान की ग्रामीण संस्कृति और जीवन की सादगी भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है।

इसी दौरान एक समानांतर दृश्य में खुले रेगिस्तान में एक ऊंट को आजाद किया जाता है। उसके पैरों से बंधी रस्सियां खोल दी जाती हैं, लेकिन वह अपनी आजादी को लेकर भी असमंजस में दिखाई देता है। यह दृश्य प्रतीकात्मक रूप से पूरी फिल्म की आत्मा को दर्शाता है।

घर पहुंचने पर सावित्री को पता चलता है कि उसके ससुर की मृत्यु हो चुकी है और यहीं से कहानी भावनात्मक रूप से गहरी होने लगती है। आर्थिक तंगी, शराबी पति, सामाजिक दबाव और एक महिला की अनकही पीड़ा धीरे-धीरे कहानी की परतों में सामने आती है।

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